42 villages in Mori have been entangled in forest laws for 71 years; villagers are still struggling for basic amenities.
उत्तरकाशी के मोरी विकासखंड की पांच पट्टियों के 42 गांवों के ग्रामीण पिछले 71 साल से वन कानूनों के चलते अपने हक-हकूकों का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि गोविंद वन्यजीव विहार के सख्त नियमों के कारण उन्हें भवन निर्माण के लिए लकड़ी लेने से लेकर सड़क, संचार और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए भी परेशान होना पड़ रहा है।
दरअसल, वर्ष 1955 में मोरी विकासखंड के बड़ासू, पंचगाई, अढोड़, फते पर्वत और सिंगतूर पट्टी के अंतर्गत आने वाली 957.96 हेक्टेयर भूमि को गोविंद वन्यजीव विहार में शामिल किया गया था। इसके बाद से ही ग्रामीणों को अपने पारंपरिक हक-हकूकों के इस्तेमाल में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
स्थानीय निवासी जगदीश रांगड़ और राजपाल रावत का कहना है कि आज भी भवन निर्माण और अन्य जरूरतों के लिए फ्री ग्रांट और पीडी की लकड़ी नहीं मिल पा रही है। वहीं, वन कानूनों के चलते जल जीवन मिशन की कई योजनाएं अधूरी हैं। सड़कों और पुलों का निर्माण भी प्रभावित हो रहा है। यहां तक कि संचार सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए बीएसएनएल को केबल बिछाने की अनुमति तक नहीं मिल पाई है।
ग्रामीणों के मुताबिक, वर्ष 2014 में तत्कालीन मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद इस संबंध में नोटिफिकेशन भी जारी हुआ था, लेकिन इसके बावजूद उन्हें कोई विशेष राहत नहीं मिली। ग्रामीणों ने राज्य सरकार से केंद्र सरकार के स्तर पर मामला उठाकर उनके हक-हकूक बहाल कराने की मांग की है।
वहीं, गोविंद वन्यजीव विहार की उपनिदेशक निधि सेमवाल के मुताबिक, ग्रामीणों के हक-हकूकों को लेकर केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा गया था। वहां से टौंस वन प्रभाग के माध्यम से सुविधाएं उपलब्ध कराने की बात कही गई थी। इसके बाद ग्रामीणों को उनके क्षेत्र से ही हक-हकूक उपलब्ध कराने के लिए एक अन्य प्रस्ताव भी केंद्र सरकार को भेजा गया है।
