पौड़ी में बढ़ती वनाग्नि बनी बड़ी चुनौती, तीन साल में 325 घटनाओं से 425 हेक्टेयर जंगल प्रभावित

उत्तराखंड में जंगल की आग लगातार गंभीर चुनौती भी बनती जा रही है और पौड़ी जिला इससे सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में शामिल भी हो गया है। हालात यह हैं कि पिछले 2 वर्षों से राज्य में सबसे अधिक वनाग्नि घटनाओं वाले जिलों में पौड़ी दूसरे स्थान पर भी बना हुआ है।

आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2023 से 2025 के बीच जिले में वनाग्नि की कुल 325 घटनाएं भी दर्ज हुईं, जिनसे करीब 425 हेक्टेयर जंगल प्रभावित भी हुआ। वर्ष 2023 में जिले में 111 घटनाएं हुई थीं, जबकि 2024 में यह संख्या बढ़कर 167 तक पहुंच भी गई। वर्ष 2025 में अब तक 47 घटनाएं सामने भी आ चुकी हैं।

तीन वर्षों में वनाग्नि का आंकड़ा

  • 2023 — 111 घटनाएं, 176.74 हेक्टेयर प्रभावित
  • 2024 — 167 घटनाएं, 209.13 हेक्टेयर प्रभावित
  • 2025 — 47 घटनाएं, 50.46 हेक्टेयर प्रभावित

वन विभाग के अनुसार सिविल सोयम पौड़ी वन प्रभाग, गढ़वाल वन प्रभाग व नागदेव रेंज सबसे संवेदनशील क्षेत्र बने हुए हैं। इस वर्ष 15 फरवरी से शुरू हुए फायर सीजन के बाद अब तक सिविल सोयम प्रभाग में 19 और गढ़वाल वन प्रभाग में 8 घटनाएं भी हो चुकी हैं।

कर्मचारियों और संसाधनों की कमी

वनाग्नि नियंत्रण के तमाम दावों के बावजूद विभाग संसाधनों की कमी से भी जूझ रहा है। सिविल सोयम वन प्रभाग की 6 रेंज में नियमित रेंजरों की जगह डिप्टी रेंजर तैनात हैं, जबकि वन आरक्षियों के 26 पद खाली भी पड़े हैं। 3 रेंज में विभागीय वाहन तक उपलब्ध नहीं हैं व फायर सीजन में किराए के वाहनों का सहारा भी लेना पड़ता है।

पिरुल भी बना आग का बड़ा कारण

वन विभाग के मुताबिक चीड़ के जंगलों में गिरने वाली सूखी पत्तियां यानी पिरुल आग फैलने का बड़ा कारण भी हैं। कमेड़ा ग्राम सभा के पास जंगलों में भारी मात्रा में पिरुल जमा भी मिला। विभाग ने पिरुल एकत्र करने पर 200 रुपये प्रति क्विंटल भुगतान की योजना शुरू की है और इससे चेक डैम व ब्रिकेट बनाने की पहल की जा रही है।

मानवजनित कारण भी जिम्मेदार

वन संरक्षक आकाश वर्मा के अनुसार चीड़ के जंगल, कम नमी व बढ़ती शुष्कता आग की घटनाओं को बढ़ा रही है। वहीं डीएफओ पवन नेगी ने बताया कि कई मामलों में मानवीय लापरवाही या जानबूझकर लगाई गई आग वजह भी बनती है। खेत साफ करने के दौरान लगाई गई आग कई बार जंगलों तक पहुंच भी जाती है।

वन विभाग का दावा

वन विभाग का कहना है कि वनाग्नि नियंत्रण के लिए लगातार प्रयास भी किए जा रहे हैं। फायर वॉचर तैनात किए गए हैं, वन कर्मियों को फायर सूट दिए गए हैं और पिरुल प्रबंधन पर काम भी हो रहा है। मुख्य वन संरक्षक सुशांत पटनायक के अनुसार वनाग्नि नियंत्रण के लिए एनडीएमए के माध्यम से 16 करोड़ रुपये से अधिक की राशि भी मिली है, जिससे पौड़ी जिले में कई कार्य भी किए जाएंगे।