Surendra Koli, acquitted in the Nithari case, dies in Haridwar; family accuses shop owner of harassment.
देश के चर्चित निठारी कांड से जुड़े मामलों में करीब 21 साल जेल में रहने के बाद सुप्रीम कोर्ट से दोषमुक्त हुए अल्मोड़ा के सुरेंद्र कोली की हरिद्वार में आत्महत्या से मौत हो गई। सुप्रीम कोर्ट से बरी होने के करीब 10 महीने बाद उसकी मौत हुई। रिहाई के बाद वह अपने गृहक्षेत्र मंगरुखाल आया था और बाद में हरिद्वार में रहकर सामान्य जीवन शुरू करने की कोशिश कर रहा था।
अल्मोड़ा जिले के स्याल्दे ब्लॉक के मंगरुखाल गांव निवासी सुरेंद्र कोली को निठारी कांड से जुड़े अंतिम लंबित मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 11 नवंबर 2025 को दोषसिद्धि रद्द करते हुए बरी कर दिया था। इसके साथ ही निठारी कांड से जुड़े उसके खिलाफ सभी आपराधिक मामलों का अंत हो गया था। जेल से बाहर आने के बाद सुरेंद्र हरिद्वार में रह रहा था और चाय की दुकान चलाकर अपनी जिंदगी दोबारा शुरू करने का प्रयास कर रहा था। इसी दौरान उसकी मौत हो गई।
दोषमुक्त होने के बाद सुरेंद्र इसी साल जून में आखिरी बार अपने पैतृक गांव मंगरुखाल पहुंचा था। परिवार ने गांव में पूजा-पाठ का कार्यक्रम रखा था, जिसमें चारों भाई शामिल हुए थे। सुरेंद्र पूजा से करीब दो दिन पहले गांव पहुंच गया था, जबकि उसके अन्य भाई कार्यक्रम के समय पहुंचे। ग्रामीणों के अनुसार, इस दौरान उसका व्यवहार सामान्य रहा। उसने लोगों से बातचीत भी की और किसी ने उसका विरोध नहीं किया।
गांव का पुश्तैनी मकान अब खंडहर में तब्दील हो चुका है। पूजा के दौरान सुरेंद्र अपने छोटे भाई आनंद कोली के बनाए घर में ठहरा था। उसकी मौत की खबर मिलने के बाद उसके भाई दिल्ली से हरिद्वार के लिए रवाना हुए। परिवार की मदद करने वाले पूर्व जिला पंचायत सदस्य नारायण सिंह रावत भी अपने साथी विशन शर्मा के साथ हरिद्वार पहुंचे। सुरेंद्र के भाई चंदन राम कोली ने बताया कि हरिद्वार पहुंचने के बाद ही आगे की कार्रवाई को लेकर निर्णय लिया जाएगा।
सुरेंद्र की कानूनी मदद करने वाले सल्ट के पूर्व जिला पंचायत सदस्य नारायण सिंह रावत ने दुकान मालिक पर उसे परेशान करने और टॉर्चर करने का आरोप लगाया है। रावत के मुताबिक, वह लगातार सुरेंद्र के संपर्क में थे और बृहस्पतिवार शाम को भी उनकी फोन पर बातचीत हुई थी। सुरेंद्र ने कथित तौर पर बताया था कि चाय की दुकान का मालिक उसे लगातार परेशान कर रहा है और किराया बढ़ाने की बात कह रहा है। रावत ने यह भी बताया कि सुरेंद्र आर्थिक परेशानियों से जूझ रहा था और इसी वजह से उन्होंने उसे 25 हजार रुपये की आर्थिक मदद भी की थी।
सुरेंद्र चार भाइयों में दूसरे नंबर का था। उसके पिता शाकरू राम और मां कुंती देवी थीं। बड़ा भाई चंदन राम कोली और छोटा भाई हरीश कोली दिल्ली में रहते हैं, जबकि सबसे छोटा भाई आनंद राम कोली अपने परिवार के साथ मासी में रहता है। कुछ समय गांव में रहने के बाद सुरेंद्र रोजगार की तलाश में दिल्ली चला गया था।
सुरेंद्र की शादी शांति देवी से हुई थी। निठारी कांड में नाम आने और जेल जाने के समय उसकी एक बेटी थी, जबकि उसका बेटा उस समय मां के गर्भ में था। परिवार के अनुसार, सुरेंद्र के जेल जाने के बाद गांव में परिवार को सामाजिक और आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ा।
ग्रामीणों के मुताबिक, वर्ष 2006 में निठारी कांड में सुरेंद्र का नाम सामने आने के बाद उसकी मां, पत्नी और बच्चों को लोगों के तानों और सामाजिक दबाव का सामना करना पड़ा। परिवार ने बच्चों के स्कूल में दाखिले में भी परेशानी आने की बात बताई। परिवार करीब आठ साल तक गांव में रहा। वर्ष 2014 में सुरेंद्र को फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद उसकी पत्नी बच्चों और सास के साथ दिल्ली चली गई। इसके बाद वह गांव नहीं लौटी। ग्रामीणों के अनुसार, बच्चों के भविष्य को देखते हुए शांति देवी ने बाद में दूसरी शादी कर ली। वर्तमान में वह कहां रह रही है, इसकी जानकारी परिवार के लोगों को भी नहीं है। करीब चार साल पहले सुरेंद्र की मां कुंती देवी का भी निधन हो गया। लंबे समय तक जेल में रहने के कारण सुरेंद्र का परिवार से संपर्क भी सीमित रहा।
पूर्व जिला पंचायत सदस्य नारायण सिंह रावत ने सुरेंद्र की कानूनी लड़ाई में भी मदद की थी। रावत के अनुसार, वर्ष 2014 में सुरेंद्र को फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद डेथ वारंट जारी हो गया था। इसके बाद उन्होंने अधिवक्ता रविंद्र सिंह गढ़िया समेत अन्य लोगों से संपर्क किया और रात में अदालत खुलवाकर मामले में हस्तक्षेप कराया। रावत के मुताबिक, अदालत के सामने यह तर्क रखा गया कि सुरेंद्र 14 मामलों में आरोपी है और यदि एक मामले में उसे फांसी दे दी जाती है तो बाकी मामलों की न्यायिक प्रक्रिया कैसे पूरी होगी। इसके बाद मामले में दोबारा सुनवाई के आदेश हुए।
नारायण सिंह रावत के अनुसार, सुरेंद्र की मां कुंती देवी और पत्नी शांति देवी से उसकी अंतिम मुलाकात डासना जेल में हुई थी। इस मुलाकात में भी उन्होंने परिवार की मदद की थी। रावत ने बताया कि सुरेंद्र की इच्छा थी कि वह एक बार अपने बेटे का चेहरा देख सके। जब वह जेल गया था, तब उसका बेटा पैदा नहीं हुआ था। बाद में डासना जेल में मुलाकात के दौरान सुरेंद्र ने पहली बार अपने बेटे का चेहरा देखा।
