Demand for scrutiny of ST certificates in Uttarakhand; RTI activist raises major questions.
देहरादून। उत्तराखंड में अनुसूचित जनजाति (एसटी) प्रमाणपत्रों के जारी होने व उनके आधार पर प्राप्त सरकारी लाभों को लेकर एक बार फिर बहस भी तेज हो गई है। आरटीआई एक्टिविस्ट एवं अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी ने राज्य गठन के बाद जारी सभी एसटी प्रमाणपत्रों की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग भी उठाई है।
विकेश नेगी ने मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन को पत्र भेजकर वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य गठन के बाद से अब तक जारी किए गए एसटी प्रमाणपत्रों की निष्पक्ष व व्यापक जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि किसी व्यक्ति को नियमों व संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत एसटी प्रमाणपत्र जारी किया गया है, तो उसके आधार पर प्राप्त सरकारी नौकरी, पदोन्नति, छात्रवृत्ति, आरक्षण व अन्य लाभों की भी समीक्षा भी की जानी चाहिए।
नेगी का कहना है कि यह मामला केवल प्रमाणपत्रों तक सीमित ही नहीं है, बल्कि संविधान, राष्ट्रपति की अधिसूचनाओं, सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों व वास्तविक जनजातीय समुदायों के अधिकारों से जुड़ा हुआ गंभीर विषय भी है।
उन्होंने भारतीय संविधान के अनुच्छेद-342 का हवाला देते हुए कहा कि अनुसूचित जनजातियों की सूची निर्धारित करने का अधिकार केवल राष्ट्रपति को प्राप्त भी है। इस सूची में किसी भी प्रकार का संशोधन, नई जाति को शामिल करने या नाम परिवर्तन का अधिकार केवल संसद के पास ही है। राज्य सरकार या कोई अन्य प्राधिकरण इसमें बदलाव ही नहीं कर सकता।
विकेश नेगी ने सर्वोच्च न्यायालय के चर्चित स्टेट ऑफ महाराष्ट्र बनाम मिलिंद (2000) मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि अनुसूचित जनजाति की सूची को उसी रूप में स्वीकार भी किया जाएगा, जैसा राष्ट्रपति की अधिसूचना में वर्णित है। किसी भी उपजाति या स्थानीय पहचान को तब तक अनुसूचित जनजाति का दर्जा ही नहीं दिया जा सकता, जब तक उसका स्पष्ट उल्लेख अधिसूचित सूची में ही न हो।
उन्होंने आरोप लगाया कि देहरादून जनपद के विकासनगर, कालसी, त्यूनी, चकराता व आसपास के क्षेत्रों में लंबे समय से एसटी प्रमाणपत्रों के जारी होने को लेकर विवाद की स्थिति भी बनी हुई है। उनका कहना है कि यदि गलत व्याख्याओं या नियमों के विपरीत प्रमाणपत्र जारी किए गए हैं व उनके आधार पर सरकारी नौकरियां, पदोन्नतियां, छात्रवृत्तियां, मुआवजे, भूमि आवंटन या आरक्षण का लाभ भी लिया गया है, तो उन सभी मामलों की निष्पक्ष जांच भी होनी चाहिए।
नेगी ने दावा किया कि कई मामलों में राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित सूची से अलग नामों या उपजातियों के आधार पर भी प्रमाणपत्र भी जारी किए जाने की शिकायतें सामने आई हैं। यदि यह सही पाया जाता है, तो यह संवैधानिक व्यवस्था व सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के विपरीत माना जाएगा।
उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय की सात न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ के स्टेट ऑफ पंजाब बनाम दविंदर सिंह (2024) फैसले का हवाला भी दिया। उनके अनुसार अदालत ने स्पष्ट किया है कि राज्य सरकारें सामाजिक न्याय के उद्देश्य से उप-वर्गीकरण भी कर सकती हैं, लेकिन अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति की मूल सूची में बदलाव करने का अधिकार केवल संसद को ही है।
विकेश नेगी ने बताया कि इस विषय पर जनजातीय कार्य मंत्रालय से भी पत्राचार भी किया गया था। मंत्रालय ने भी स्पष्ट किया कि अनुसूचित जनजातियों से संबंधित विषय संविधान के अनुच्छेद-342 के अंतर्गत आता है व अंतिम निर्णय संसद के माध्यम से ही संभव है।
मुख्य सचिव को भेजे गए पत्र में उन्होंने मांग की है कि साल 2000 के बाद जारी सभी विवादित एसटी प्रमाणपत्रों की जांच कराई जाए। जो प्रमाणपत्र संवैधानिक व वैधानिक मानकों के अनुरूप नहीं पाए जाएं, उन्हें निरस्त किया जाए व उनके आधार पर प्राप्त सरकारी लाभों की विधिक समीक्षा कर आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित भी की जाए।
इसके अलावा उन्होंने यह भी मांग की है कि यदि जांच में किसी अधिकारी की भूमिका सामने भी आती है, तो उसके खिलाफ विभागीय, दंडात्मक व आपराधिक कार्रवाई की जाए। साथ ही सभी विभागों, विश्वविद्यालयों, आयोगों, निगमों, शिक्षा, स्वास्थ्य, पुलिस, पंचायत व स्थानीय निकायों से संबंधित लाभार्थियों का विवरण सार्वजनिक किया जाए, ताकि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी भी बन सके।
विकेश सिंह नेगी का कहना है कि यह मामला लाखों युवाओं के भविष्य व वास्तविक जनजातीय समुदायों के अधिकारों से भी जुड़ा हुआ है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि सरकार इस विषय पर समयबद्ध व प्रभावी कार्रवाई नहीं करती, तो मामला न्यायालय और राष्ट्रीय स्तर पर भी उठाया जाएगा।
