गंगा की स्वच्छता पर कैग की रिपोर्ट में उठे सवाल, कई शहरों से अब भी गंगा में गिर रहा सीवर

देहरादून: लोगों की आस्था का केंद्र मानी जाने वाली गंगा नदी को स्वच्छ बनाने के लिए सरकार करोड़ों रुपये भी खर्च कर रही है, लेकिन इसके बावजूद कई शहरों में सीवर व नालों का गंदा पानी अब भी गंगा में ही गिर रहा है। इससे गंगा की स्वच्छता को लेकर चलाए जा रहे अभियानों की प्रभावशीलता पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।

नमामि गंगे कार्यक्रम को लेकर भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में कई खामियां भी सामने आई हैं। रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड में गंगा से संबंधित कुल 42 परियोजनाओं में से 23 परियोजनाओं की साल 2018 से 2022-23 के बीच जांच की गई। ये परियोजनाएं सीवेज प्रबंधन, रिवर फ्रंट डेवलपमेंट, घाटों की सफाई, वनरोपण व औद्यानिकी विकास से जुड़ी थीं।

जांच में पाया गया कि राज्य गंगा समिति व राज्य गंगा मिशन ने स्थानीय समुदाय की भागीदारी के साथ सीवेज शोधन अवसंरचना की सही योजना और प्रभावी क्रियान्वयन ही नहीं किया। साथ ही राज्य सरकार ने भी गंगा तटवर्ती शहरों में सीवरेज सुविधाओं को सुधारने के लिए अपने संसाधनों से पर्याप्त योगदान ही नहीं दिया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इसी कारण कई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) घरेलू सीवर नेटवर्क से जुड़े ही नहीं हैं या आंशिक रूप से ही जुड़े हुए हैं। मौजूदा एसटीपी में भी पर्याप्त शोधन क्षमता का अभाव है, जिससे बड़ी मात्रा में अशोधित सीवेज सीधे गंगा में प्रवाहित भी हो रहा है।

कैग ने यह भी बताया कि उत्तराखंड जल संस्थान ने 18 एसटीपी के निर्माण व संचालन को कर्मियों की कमी के कारण अपने नियंत्रण में लेने से भी मना कर दिया। इसके अलावा राज्य गंगा समिति ने एसटीपी का समय पर सुरक्षा ऑडिट भी नहीं कराया, जिससे मानव जीवन व नमामि गंगे परियोजनाओं की परिसंपत्तियों को नुकसान होने का खतरा भी बना रहा।

जोशीमठ में भू-धंसाव से भी जुड़ी सीवेज समस्या

कैग रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि साल 2010 में केंद्र सरकार ने 9.61 करोड़ रुपये की लागत से जोशीमठ में 27.67 किलोमीटर सीवर लाइन बिछाने की योजना को मंजूरी भी दी थी। इस योजना में नाला टैपिंग शामिल थी, लेकिन एसटीपी निर्माण का प्रावधान ही नहीं किया गया था। लगभग 9.57 करोड़ रुपये खर्च होने के बाद 2017 में यह योजना बंद भी कर दी गई।

रिपोर्ट के अनुसार 2010 से 2017 के बीच करीब 42.73 करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद विकसित अवसंरचना से किसी भी घर का सीवेज संयोजन ही नहीं हो पाया। जोशीमठ में भू-धंसाव की घटनाओं के पीछे कमजोर सीवेज प्रणाली को भी एक कारण भी माना गया है। इस समस्या के समाधान के लिए साल 2023 में 202 करोड़ रुपये की लागत से नया सीवर नेटवर्क बिछाने और घरेलू संयोजन देने का प्रस्ताव राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन को भी भेजा गया।

एसटीपी की गुणवत्ता पर भी सवाल

कैग रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि कई सीवेज शोधन संयंत्रों में शोधन की गुणवत्ता मानकों के अनुरूप ही नहीं पाई गई। अधिकांश एसटीपी ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल व केंद्र सरकार के निर्धारित मानकों का पालन ही नहीं किया।

जल गुणवत्ता के आकलन में देवप्रयाग तक गंगा का जल बेहतर श्रेणी में पाया गया, जबकि ऋषिकेश में 2019 से 2023 के बीच जल गुणवत्ता निम्न श्रेणी में भी दर्ज की गई। हरिद्वार जिले में भी इस दौरान गंगा के जल की गुणवत्ता लगातार खराब श्रेणी में भी बनी रही।

सात गंगा तटवर्ती नगरों में मिली कमी

रिपोर्ट के मुताबिक जोशीमठ, नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग, कीर्तिनगर, चगोली व श्रीनगर जैसे सात गंगा तटवर्ती नगरों में सीवेज प्रबंधन में गंभीर खामियां भी पाई गईं। यहां लगे एसटीपी नालों से आने वाले केवल धूसर पानी का ही शोधन कर पा रहे हैं, जबकि घरेलू सीवेज का बड़ा हिस्सा बिना शोधन के ही बह भी रहा है।