Standoff between farmers and the Forest Department over land in the Terai; anger mounts following action taken against crops.
उत्तराखंड सीमा से लखीमपुर खीरी तक फैले तराई क्षेत्र में जमीन को लेकर किसानों और वन विभाग के बीच विवाद गहराता जा रहा है। किसानों का आरोप है कि दशकों से खेती कर रहे उनकी जमीनों को वन विभाग अपनी जमीन बताते हुए कब्जामुक्ति अभियान चला रहा है। किसानों के मुताबिक, कई स्थानों पर खड़ी फसलों पर जेसीबी और ट्रैक्टर चलाकर उन्हें नष्ट किया गया है। वहीं, वन विभाग इसे अतिक्रमण के खिलाफ चलाया जा रहा अभियान बता रहा है।
तराई क्षेत्र के किसानों का कहना है कि आजादी के बाद पाकिस्तान से आए परिवारों को जंगलों की जमीन कृषि के लिए आवंटित की गई थी। कई किसानों के पास पट्टे, रजिस्ट्रियां और अन्य दस्तावेज होने का दावा है। इसके बावजूद चकबंदी के दौरान कई जमीनों के वन विभाग के नाम दर्ज होने से विवाद खड़ा हुआ। किसानों का कहना है कि इन मामलों में कई मुकदमे अदालतों में विचाराधीन हैं, फिर भी खेतों पर कार्रवाई की जा रही है।
उत्तराखंड-पीलीभीत सीमा से लगे पस्तौर गांव के किसान जोगिंदर सिंह के मुताबिक, कई परिवार 1947 के बाद से जमीन पर खेती कर रहे हैं और उनके पास दस्तावेज भी हैं। उनका कहना है कि जंगल और दुर्गम परिस्थितियों के बीच जमीन को खेती योग्य बनाने के बाद अब किसानों को भूमिहीन होने का डर सता रहा है।
शाहजहांपुर के बंडा क्षेत्र के फगुनहाई गांव के किसान बलजीत सिंह ने बताया कि उनके परिवार के बुजुर्गों के नाम आजादी के बाद करीब 48 एकड़ जमीन के पट्टे हुए थे। उनके अनुसार, 1971-72 की चकबंदी में जमीन वन विभाग के नाम दर्ज हो गई। मामला अदालत में विचाराधीन होने के बावजूद 27 जुलाई को खेतों में जेसीबी और ट्रैक्टर चलाकर फसलें नष्ट कर दी गईं। बलजीत सिंह समेत करीब 25 किसान परिवारों पर कार्रवाई किए जाने का भी दावा किया गया है।
शाहजहांपुर के नवदिया बंकी और गहलोइया मजरे में भी किसान जमीन को लेकर परेशान हैं। किसानों के अनुसार, कई परिवार दो से चार एकड़ तक की जमीन पर खेती करते हैं। उनका आरोप है कि वन विभाग की टीम ने अचानक पहुंचकर खेतों में कार्रवाई की। गहलोइया के किसानों का कहना है कि उनके बुजुर्गों के नाम पुराने पट्टे होने के बावजूद चकबंदी में जमीन जंगलात के नाम दर्ज हो गई। किसानों के मुताबिक, करीब 40 एकड़ क्षेत्र में तारबंदी भी की गई है।
पीलीभीत और उत्तराखंड सीमा के किसानों ने भी ऐसी ही शिकायतें सामने रखी हैं। उनका कहना है कि खेती उनकी आजीविका का मुख्य आधार है और जमीन पर विवाद के कारण परिवारों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो रहा है। कुछ किसानों ने अदालत में मामले लंबित होने के बावजूद कार्रवाई किए जाने पर भी सवाल उठाए हैं।
वन विभाग की ओर से इसे अतिक्रमण के खिलाफ चलाया जा रहा कब्जामुक्ति अभियान बताया गया है। विभाग का कहना है कि सरकारी और वन भूमि पर किए गए अतिक्रमण को हटाने की कार्रवाई नियमों के तहत की जा रही है।
वहीं, प्रशासनिक स्तर पर कहा गया है कि तराई से मिल रही शिकायतों की जांच सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और इंडियन फॉरेस्ट एक्ट के प्रावधानों के तहत कराई जाएगी। अधिकारियों के अनुसार, जांच के बाद जमीनों की स्थिति और कार्रवाई के कारण स्पष्ट किए जाएंगे तथा उचित समाधान निकालने का प्रयास किया जाएगा।
