Rising bear menace in Uttarakhand 4 dead, 40 injured in 9 months.
उत्तराखंड में भालू के आबादी वाले क्षेत्रों में पहुंचने और लोगों पर हमले करने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। चमोली, उत्तरकाशी और टिहरी समेत कई जिलों में भालू की दहशत बनी हुई है। विशेषज्ञों के मुताबिक, हाइबरनेशन यानी शीतनिद्रा में जाने से पहले भालू अपने शरीर में चर्बी बढ़ाने के लिए भोजन की तलाश करता है। इसी वजह से वह जंगलों से निकलकर आबादी वाले क्षेत्रों तक पहुंच रहा है। वन विभाग ने भी लोगों को सतर्क रहने की अपील करते हुए संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा बढ़ाने के निर्देश दिए हैं।
भारतीय वन्यजीव संस्थान के सेवानिवृत्त वैज्ञानिक सत्य कुमार के अनुसार, हाइबरनेशन से पहले भालू अपने शरीर में चर्बी जमा करता है, जिससे शीतनिद्रा के दौरान उसे ऊर्जा मिलती रहे। इसके लिए वह जंगल से लेकर आबादी वाले क्षेत्रों तक भोजन की तलाश करता है। इस लिहाज से अक्टूबर का महीना महत्वपूर्ण है। ऐसे में लोगों को सावधानी बरतने और सामुदायिक स्तर पर भी सुरक्षा के प्रयास करने की जरूरत है।
अपर प्रमुख वन संरक्षक वन्यजीव विवेक पांडे ने बताया कि सितंबर से नवंबर और फरवरी में भालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है। भोजन की तलाश में उनके आबादी की ओर आने से मानव-वन्यजीव संघर्ष का खतरा बढ़ जाता है। इसे देखते हुए वन मुख्यालय ने वनाधिकारियों को संवेदनशील क्षेत्रों में गश्त बढ़ाने, कैमरा ट्रैप लगाने और लोगों को जागरूक करने के निर्देश दिए हैं। आबादी के पास कूड़े के ढेर भी भालुओं को आकर्षित करते हैं। ऐसे स्थानों पर जिला प्रशासन के सहयोग से सफाई कराने और अन्य सुरक्षात्मक कदम उठाने को कहा गया है।
9 महीने में भालू के हमलों की 44 घटनाएं
प्रदेश में जनवरी से सितंबर तक भालू के हमलों में चार लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 40 लोग घायल हुए हैं। हमलों के अलावा भालुओं ने कई भवनों को भी नुकसान पहुंचाया है।
उत्तरकाशी से टिहरी तक भालू की दहशत
उत्तरकाशी जिले के ज्ञाणजा गांव में भालू की लगातार आवाजाही से लोग जंगल जाने से कतरा रहे हैं। चमोली जिले के नेल सिदेली गांव में भालू के डर से अभिभावक बच्चों को खुद स्कूल छोड़ने जा रहे हैं। वहीं, टिहरी जिले के टोला गांव में भालू ने चार मकानों को क्षतिग्रस्त कर दिया है। इन घटनाओं से ग्रामीण क्षेत्रों में दहशत का माहौल बना हुआ है।
