From an identity defined by migration to a new hope: The ‘Dwardhaka Tok’ of Jijoli village has been renamed ‘Devkunj Bakhli’.
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में लगातार बढ़ते पलायन के बीच बागेश्वर जिले के गरुड़ विकासखंड स्थित जिजोली गांव से एक सकारात्मक पहल सामने आई है। पलायन और वीरान होते गांव की पहचान से बाहर निकलने की कोशिश में ग्रामीणों ने द्वारढका तोक का नाम बदलकर ‘देवकुंज बाखली’ रख दिया है। सोमवार को पारंपरिक पूजा-पाठ और जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी में नए नाम का विधिवत शुभारंभ किया गया। ग्रामीणों का मानना है कि यह बदलाव क्षेत्र में लौटती रौनक, युवाओं की वापसी और नई उम्मीदों का प्रतीक बनेगा।
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, द्वारढका तोक लंबे समय से पलायन और रोजगार की कमी जैसी समस्याओं से जूझ रहा था। यहां आबादी कम होने और आजीविका के सीमित साधनों के कारण कई परिवार दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों की ओर चले गए थे। ग्रामीण गोविंद जोशी ने बताया कि वर्तमान में इस तोक में करीब 10 परिवार निवास कर रहे हैं।
हालांकि, कोरोना महामारी और लॉकडाउन के बाद गांव की तस्वीर में बदलाव आने लगा। कई युवाओं ने शहरों से अपने पैतृक गांव लौटकर स्वरोजगार के माध्यम से आजीविका के नए रास्ते तलाशने शुरू किए। इससे क्षेत्र में गतिविधियां बढ़ीं और गांव में फिर से रौनक लौटने लगी।
युवाओं की वापसी और गांव में हो रहे सकारात्मक बदलावों को नई पहचान देने के उद्देश्य से ग्रामीणों ने तोक का नाम बदलने का निर्णय लिया। श्यामखेत आश्रम के स्वामी शंकरानंद गिरी महाराज ने इसे ‘देवकुंज बाखली’ नाम दिया, जिसे ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से स्वीकार किया।
सोमवार को आयोजित कार्यक्रम में पंडित चंद्रशेखर कांडपाल ने वैदिक मंत्रोच्चार और पारंपरिक विधि-विधान के साथ नए नाम का शुभारंभ कराया। इस अवसर पर ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों ने एकजुट होकर गांव के विकास और उसकी पहचान को मजबूत करने की उम्मीद जताई।
कार्यक्रम में अधिवक्ता डीके जोशी, जिजोली की ग्राम प्रधान कलावती देवी, क्षेत्र पंचायत सदस्य प्रेमा जोशी, पूर्व ग्राम प्रधान भोला दत्त पांडे, ऋतुराज जोशी, आनंद सिंह दोसाद, भवानी देवी जोशी, दिनेश भट्ट, प्रकाश भट्ट, दीप भट्ट और दुर्गा देवी सहित अन्य लोग मौजूद रहे।
देवकुंज बाखली नामकरण की यह पहल केवल नाम बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि गांव के लोगों की नई सोच और अपने पैतृक क्षेत्र से दोबारा जुड़ने के प्रयास को भी दर्शाती है। पलायन से प्रभावित पर्वतीय क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर विकसित करना और युवाओं को गांव में ही बेहतर भविष्य की संभावनाएं उपलब्ध कराना ऐसे प्रयासों को स्थायी बनाने के लिए महत्वपूर्ण होगा।
