Discovery of 13 new species of Drosophilids in the Mandakini Valley gives a new direction to research on Himalayan biodiversity.
पश्चिमी हिमालय की जैव विविधता को लेकर वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। उत्तराखंड के केदारनाथ क्षेत्र की मंदाकिनी घाटी में किए गए शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने ड्रोसोफिलिड्स यानी फलमक्खी समूह की कुल 37 प्रजातियों की पहचान की। इनमें 13 प्रजातियां ऐसी हैं, जिन्हें इस अध्ययन के तहत नई प्रजातियों के रूप में दर्ज किया गया है। शोध में इन प्रजातियों का पहली बार आणविक डीएनए विश्लेषण भी किया गया, जिससे उनकी वैज्ञानिक पहचान और जैविक संबंधों को समझने में मदद मिली है।
आकार में बेहद छोटी होने वाली फलमक्खी वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। आनुवंशिकी के अध्ययन में इसका व्यापक उपयोग किया जाता है। इसके अलावा विकास, कोशिका विज्ञान, तंत्रिका तंत्र, व्यवहार और विभिन्न रोगों से जुड़े शोध में भी फलमक्खी अहम भूमिका निभाती है। ऐसे में हिमालयी क्षेत्र में इनकी प्रजातियों की पहचान से जैव विविधता के अध्ययन को नई जानकारी मिली है।
गढ़वाल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर राजेंद्र सिंह फर्त्याल और उनकी शोध टीम लंबे समय से फलमक्खियों की विविधता पर काम कर रही है। टीम अब तक 56 नई ड्रोसोफिलिड प्रजातियों की खोज कर चुकी है। ये प्रजातियां उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, कश्मीर और पश्चिम बंगाल के विभिन्न क्षेत्रों से मिली हैं। इनमें से अधिकांश प्रजातियों से संबंधित शोध प्रकाशित हो चुके हैं, जबकि कुछ पर अध्ययन अभी जारी है।
मंदाकिनी घाटी में किए गए अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं ने अलग-अलग स्थानों से जैविक नमूने एकत्र किए। इसके बाद प्रजातियों की पहचान के लिए उनके पारंपरिक शारीरिक लक्षणों का अध्ययन किया गया। साथ ही, आणविक स्तर पर डीएनए की जांच भी की गई। आधुनिक डीएनए विश्लेषण और डीएनए बारकोडिंग तकनीक ने प्रजातियों की पहचान को अधिक विश्वसनीय बनाने में मदद की।
यह शोध 7 अक्टूबर को इंटरनेशनल जर्नल ऑफ ट्रॉपिकल इंसेक्ट साइंस में प्रकाशित हुआ। शोध टीम में प्रो. राजेंद्र सिंह फर्त्याल के साथ डॉ. सोनाली खाली और डॉ. गौरव भट्ट शामिल रहे। दून विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ बायोलॉजिकल साइंसेज के डॉ. विवेकानंद बहुगुणा ने भी शोध में योगदान दिया।
इस अध्ययन से पश्चिमी हिमालय की कीट विविधता के बारे में वैज्ञानिक जानकारी बढ़ी है। साथ ही, पारंपरिक पहचान पद्धतियों के साथ आधुनिक डीएनए तकनीक के इस्तेमाल से प्रजातियों के वर्गीकरण और उनके विकास संबंधी संबंधों को समझने के नए अवसर सामने आए हैं।
