India's demand: UN should include terrorist crimes in the category of crimes against humanity.
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भारत ने संयुक्त राष्ट्र में आतंकवादी गतिविधियों और उनके गंभीर अत्याचारों को मानवता के खिलाफ अपराधों की प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय संधि के दायरे में शामिल करने की पैरवी की है। भारत का कहना है कि ऐसे आतंकवादी अपराध, जो निर्धारित कानूनी मानकों और गंभीरता की शर्तों को पूरा करते हैं, उन्हें संधि में उचित स्थान मिलना चाहिए। इस प्रस्तावित संधि को वर्ष 2028 में होने वाले सम्मेलन में अपनाने की योजना है। इसका उद्देश्य मानवता के खिलाफ अपराधों की रोकथाम करना और दोषियों को सजा दिलाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कानूनी व्यवस्था मजबूत करना है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा की छठी समिति की बैठक में भारत के संयुक्त राष्ट्र मिशन की काउंसलर आर. मैथिली ने यह मुद्दा उठाया। यह समिति कानूनी मामलों पर विचार करती है। बैठक में मानवता के खिलाफ अपराधों को रोकने और उनके लिए जिम्मेदार लोगों को दंडित करने से संबंधित प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय संधि पर चर्चा हुई।
आर. मैथिली ने कहा कि आतंकवादी हमले बेहद गंभीर होते हैं और समाज तथा आम लोगों पर उनका गहरा प्रभाव पड़ता है। इसलिए आतंकवाद से जुड़े उन अपराधों को प्रस्तावित संधि में शामिल करने पर विचार किया जाना चाहिए, जो मानवता के खिलाफ अपराधों की निर्धारित शर्तों को पूरा करते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसा करते समय संधि के मूल उद्देश्य और कानूनी ढांचे को ध्यान में रखना आवश्यक है। मौजूदा कानूनी व्यवस्थाओं को बिना आवश्यक बदलाव के नई संधि में शामिल करना उचित नहीं होगा।
भारत ने यह भी जोर दिया कि मानवता के खिलाफ अपराधों और बड़े पैमाने पर होने वाले अत्याचारों के मामलों में न्याय सुनिश्चित करना संबंधित देशों की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। प्रस्तावित संधि में इस सिद्धांत को मजबूत करने की जरूरत है, ताकि देश अपने राष्ट्रीय कानूनों के तहत ऐसे अपराधों की जांच कर सकें और दोषियों की जवाबदेही तय कर सकें।
भारत के अनुसार, इस दिशा में तीन प्रमुख सिद्धांतों का ध्यान रखना जरूरी है। पहला, गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों और बड़े पैमाने पर होने वाले अत्याचारों के मामलों में देशों को अपने कानूनों के तहत न्याय सुनिश्चित करना चाहिए। दूसरा, ऐसे मामलों में संबंधित देशों के अधिकार क्षेत्र को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जबकि न्याय की जरूरतों, आरोपियों के अधिकारों और पीड़ितों के हितों के बीच संतुलन बनाए रखना भी आवश्यक है। तीसरा, मानवता के खिलाफ अपराधों की रोकथाम और दोषियों को सजा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों में देशों की संप्रभुता तथा उनके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने के सिद्धांत का सम्मान किया जाना चाहिए।
भारत की दलील है कि प्रस्तावित संधि केवल अपराधों के लिए जवाबदेही तय करने तक सीमित न रहे, बल्कि इसमें देशों की प्राथमिक जिम्मेदारी और उनके कानूनी अधिकार क्षेत्र को भी पर्याप्त महत्व दिया जाए। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और न्याय सुनिश्चित करने की प्रक्रिया में संप्रभुता के सिद्धांत की अनदेखी नहीं होनी चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2004 में एक प्रस्ताव पारित कर 2028 में मानवता के खिलाफ अपराधों की रोकथाम और सजा से संबंधित सम्मेलन आयोजित करने की प्रक्रिया का आह्वान किया था। इस दिशा में संधि का मसौदा तैयार करने और उस पर सदस्य देशों के बीच बातचीत के लिए दो तैयारी सम्मेलन आयोजित किए जाने हैं। इनमें पहला सम्मेलन जनवरी में हुआ था।
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य ऐसी कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय संधि तैयार करना है, जो मानवता के खिलाफ अपराधों को रोकने, उनकी जांच करने और दोषियों को सजा दिलाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक प्रभावी कानूनी ढांचा उपलब्ध कराएगी।
