Why is the conch shell not blown at Badrinath Dham? Several beliefs linked to demons exist.
बदरीनाथ धाम भगवान विष्णु को समर्पित है और शंख भगवान विष्णु को प्रिय माना जाता है। विष्णु मंदिरों में आमतौर पर शंख ध्वनि की परंपरा है, लेकिन बदरीनाथ मंदिर में शंख नहीं बजाया जाता। हालांकि मंदिर में नित्य पूजा, अभिषेक और महाभिषेक शंख से ही किए जाते हैं। भगवान बदरीनाथ, महालक्ष्मी, नर-नारायण और कुबेर देवता के भोग को भी शंख से पवित्र करने के बाद ही भगवान को अर्पित किया जाता है।
मान्यता है कि बदरीनाथ मंदिर में शंख बजाने से बातापी नाम का राक्षस जाग सकता है। कथा व्यास आचार्य अनसूया प्रसाद नौटियाल के अनुसार, आदिकाल में हिमालय क्षेत्र में राक्षसों का आतंक था। इसी दौरान महर्षि अगस्त्य ने कुसमांडा देवी का ध्यान किया और देवी के प्रकट होने पर राक्षसों का वध किया गया। आतापी और बातापी नाम के दो राक्षस वहां से भाग निकले। मान्यता के अनुसार आतापी मंदाकिनी नदी में और बातापी बदरीनाथ मंदिर में शंख में जाकर छिप गया। तभी से धाम में शंख बजाना वर्जित माना जाता है।
बदरीनाथ मंदिर में शंख न बजाने को लेकर एक अन्य मान्यता शंखचूड़ राक्षस की कथा से भी जुड़ी है। बदरीनाथ के पूर्व धर्माधिकारी भुवन चंद्र उनियाल के अनुसार, हनुमान चट्टी के बाद शंख ध्वनि नहीं की जाती। उनका कहना है कि भगवान बदरीनाथ धाम में साक्षात विराजमान हैं, इसलिए उनके आवाहन के लिए शंख बजाने की आवश्यकता नहीं है।
