There is no need to look outside the mountains for employment; the path to prosperity lies hidden in agriculture and horticulture.
उत्तराखंड के पहाड़ों से पलायन रोकने और गांवों को दोबारा आबाद करने के लिए आखिर रास्ता क्या हो सकता है? क्या बड़े उद्योग इसका समाधान हैं, या फिर होटल और पर्यटन? पद्मश्री प्रगतिशील किसान डॉ. प्रेमचंद शर्मा का मानना है कि पहाड़ की अपनी जमीन, जलवायु और कृषि क्षमता को ही रोजगार और अर्थव्यवस्था का आधार बनाया जा सकता है। उनके मुताबिक जरूरत पहाड़ की खेती को वैज्ञानिक तकनीक, बेहतर बाजार और फूड प्रोसेसिंग से जोड़ने की है।
देहरादून के जौनसार-बावर क्षेत्र के चकराता ब्लॉक के अटाल गांव में 1957 में जन्मे डॉ. प्रेमचंद शर्मा ने महज पांचवीं तक पढ़ाई की, लेकिन खेती में अपने प्रयोगों और नवाचारों के दम पर अलग पहचान बनाई। किसान परिवार से आने वाले डॉ. शर्मा ने सामाजिक क्षेत्र में भी सक्रिय भूमिका निभाई और 1984 से 1998 तक ग्राम पंचायत में उप प्रधान और प्रधान के रूप में काम किया।
उनकी कृषि यात्रा एक अनार के पेड़ से शुरू हुई। घर के पास लगे गणेश प्रजाति के अनार के पेड़ पर बड़े फल तो आते थे, लेकिन उनमें कीड़े लग जाते थे। डॉ. शर्मा ने इसे सामान्य समस्या मानकर छोड़ने के बजाय इसके कारण का पता लगाया। उद्यान विभाग के अधिकारियों से जानकारी लेने के बाद उन्होंने फूल आने के समय कीट नियंत्रण का प्रयोग किया और सफलता हासिल की।
इसके बाद उन्होंने महाराष्ट्र के सोलापुर और हिमाचल से अनार की अलग-अलग किस्में मंगाकर प्रयोग शुरू किए। करीब 2200 पौधे तैयार किए गए। कर्नाटक के किसान बसवराज पाटिल के अनार बागान का दौरा करने के दौरान उन्हें ड्रिप सिंचाई और वैज्ञानिक तरीके से बड़े पैमाने पर खेती करने की तकनीक देखने का अवसर मिला। इसके बाद उन्होंने अपने क्षेत्र में भी आधुनिक तकनीकों को अपनाना शुरू किया।
1994 में उन्होंने करीब 0.4 हेक्टेयर क्षेत्र में अनार की खेती शुरू की और वर्ष 2000 से अपने खेत पर उन्नत पौध तैयार करने की नर्सरी भी शुरू की। इसके जरिए बड़ी संख्या में पौध दूसरे किसानों तक पहुंचाई गई।
डॉ. शर्मा का प्रयोग सिर्फ अनार तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने अपने करीब 940 मीटर ऊंचाई वाले क्षेत्र में सेब की खेती को लेकर भी प्रयोग किए। कम चिलिंग आवश्यकता वाली किस्मों पर काम किया और पेड़ों को कृत्रिम तरीके से ठंड उपलब्ध कराने के लिए फॉगिंग जैसी तकनीक का इस्तेमाल किया। इसके अलावा ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई, प्लास्टिक मल्च, रंगीन शिमला मिर्च, फूलगोभी, टमाटर, चेरी टमाटर और लाल पत्तागोभी जैसी फसलों पर भी प्रयोग किए।
डॉ. शर्मा का मानना है कि उत्तराखंड की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविध जलवायु और ऊंचाई है। अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग फसलों और बागवानी की संभावनाएं मौजूद हैं। उनका कहना है कि युवा रोजगार की तलाश में शहरों की ओर जाने के बजाय कृषि को व्यवसाय के रूप में अपनाएं। खेती सिर्फ उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि बीज, पौध, नर्सरी, उत्पादन, परिवहन, प्रसंस्करण और बाजार तक रोजगार के कई अवसर पैदा करती है।
इसी सोच के तहत 2013 में करीब 200 किसान परिवारों को जोड़कर फल और सब्जी उत्पादक समिति बनाई गई। बाद में करीब 225 किसान परिवार फल और सब्जी उत्पादन से जुड़े। उनके प्रयासों से आसपास के 25 से अधिक गांवों में भी किसानों ने इस मॉडल को अपनाया और करीब एक हजार किसानों को इसका लाभ मिला। कुछ ऐसे लोग भी गांव लौटे, जो रोजगार के लिए बाहर चले गए थे।
हालांकि डॉ. शर्मा मानते हैं कि पहाड़ की कृषि के सामने सबसे बड़ी चुनौती उत्पादन नहीं, बल्कि बाजार है। किसान फसल तो पैदा कर सकता है, लेकिन अगर उसे लागत के मुताबिक कीमत नहीं मिलेगी तो खेती से उसका भरोसा टूट सकता है। ऐसे में वह फूड प्रोसेसिंग को बेहद जरूरी मानते हैं।
उनके अनुसार अगर टमाटर या किसी दूसरी फसल का बाजार भाव गिर जाए तो उसे औने-पौने दाम पर बेचने या फेंकने के बजाय उसका प्रसंस्करण किया जा सकता है। इससे उत्पाद की शेल्फ लाइफ बढ़ेगी और किसान को वैकल्पिक आय का रास्ता मिलेगा। उनका मॉडल साफ है—उगाओ, प्रसंस्करण करो, मूल्य बढ़ाओ और बाजार तक पहुंचाओ।
डॉ. शर्मा काली हल्दी, सहजन और करी पत्ते जैसे स्थानीय उत्पादों में भी नई आर्थिक संभावनाएं देखते हैं। उनका मानना है कि पहाड़ के स्थानीय उत्पादों को सिर्फ पारंपरिक इस्तेमाल तक सीमित रखने के बजाय उनसे मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार किए जाएं, ताकि किसानों की आमदनी बढ़ सके।
सरकारी योजनाओं को लेकर भी डॉ. शर्मा का मानना है कि उनका लाभ वास्तविक रूप से खेती करने वाले किसानों तक पहुंचना चाहिए। वह अपने क्षेत्र में सिंचाई के लिए प्रधानमंत्री कुसुम योजना के तहत मिले सौर पंपों का उदाहरण देते हैं। उनके मुताबिक सिंचाई की सुविधा मिलने के बाद ऐसी जमीनों पर भी खेती संभव हुई, जहां पहले पानी की कमी बड़ी समस्या थी।
उनका मानना है कि प्रगतिशील किसानों को जोड़कर ऐसा नेटवर्क बनाया जाना चाहिए, जहां किसान दूसरे किसानों को जमीन की वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर व्यावहारिक सलाह दे सकें। क्योंकि खेत में प्रयोग कर सफलता हासिल करने वाला किसान दूसरे किसान की समस्याओं को ज्यादा करीब से समझ सकता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की याद भी डॉ. शर्मा के लिए बेहद खास है। पद्म पुरस्कार समारोह के दौरान प्रधानमंत्री से हुई बातचीत को याद करते हुए वह भावुक हो जाते हैं। उनके मुताबिक प्रधानमंत्री ने उन्हें और उत्तराखंड से जुड़े पुराने संदर्भों को याद रखा। डॉ. शर्मा के लिए यह मुलाकात उनके जीवन की सबसे यादगार स्मृतियों में शामिल है।
डॉ. प्रेमचंद शर्मा की पूरी सोच को अगर एक लाइन में समझें तो उनका संदेश साफ है—पहाड़ में रोजगार पैदा करने के लिए पहाड़ को छोड़कर बाहर देखने की जरूरत नहीं है। खेत, पानी, जलवायु और स्थानीय उत्पादों को वैज्ञानिक तकनीक, प्रसंस्करण और बाजार से जोड़ दिया जाए तो गांव खुद रोजगार और अर्थव्यवस्था के केंद्र बन सकते हैं। असली चुनौती अब इस सोच को कितनी गंभीरता से जमीन पर लागू किया जाता है, इसकी है।
