Questions over the Nagrasu Gurudwara incident A lapse by the intelligence network or an oversight
नगरासू गुरुद्वारे में शनिवार शाम हुए घटनाक्रम ने अब सुरक्षा व खुफिया तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि 16 जून को कर्णप्रयाग में हुए विवाद के बाद भी उन निहंगों की गतिविधियों का कोई पूर्व आकलन क्यों नहीं हो सका, जो 3 दिनों से गुरुद्वारे में मौजूद थे।
सूत्रों व गुरुद्वारा प्रबंधन के अनुसार 7 निहंग 3 दिन पहले नगरासू पहुंचे थे व श्रद्धालुओं की तरह परिसर में रह रहे थे। इस दौरान उनकी प्रबंधन से कई दौर की बातचीत भी हुई, जिसमें वे बड़ी संख्या में लोगों को गुरुद्वारे में ठहराने की मांग भी कर रहे थे। सहमति न बनने पर विवाद की स्थिति भी बन गई।
प्रबंधन का यह भी दावा है कि शुरुआती तनाव के बाद निहंगों ने माफी मांगी थी, जिससे किसी बड़े टकराव की आशंका भी कम लग रही थी। लेकिन बाद में उन्होंने अचानक गुरुद्वारे की ऊपरी मंजिलों पर कब्जा कर लिया व स्थिति तनावपूर्ण हो गई।
सूत्रों के अनुसार इनमें से एक निहंग पहले इसी गुरुद्वारे में सेवादार रह चुका था, जिससे उसे भवन व व्यवस्था की पूरी जानकारी थी। माना जा रहा है कि इसी कारण वे जल्दी से ऊपरी हिस्से तक पहुंचने और वहां टिके रहने में सफल भी रहे।
इस पूरे घटनाक्रम में सोशल मीडिया की भूमिका पर सवाल भी उठ रहे हैं, जहां कथित तौर पर कर्णप्रयाग प्रकरण को लेकर भड़काऊ संदेश और 25 जून को एकत्र होने के आह्वान वाले पोस्ट प्रसारित हुए। इसके बावजूद सुरक्षा एजेंसियां संभावित तनाव का सही आकलन ही नहीं कर सकीं।
घटना के बाद स्थानीय स्तर पर खुफिया तंत्र की सक्रियता व सतर्कता को लेकर सवाल तेज हो गए हैं। लोगों का कहना है कि समय रहते कार्रवाई होती तो स्थिति को बिगड़ने से रोका भी जा सकता था।
