उत्तराखंड की राजनीति में फिर हलचल, कैबिनेट विस्तार से धामी ने दिए कई संदेश

देहरादून: उत्तराखंड की राजनीति भले ही पहाड़ों की तरह शांत दिखाई देती हो, लेकिन इसके भीतर हमेशा हलचल व ताप बना रहता है। राज्य के 25 साल के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो शायद ही कोई सीएम पूरी तरह सहज और बिना दबाव के सरकार भी चला पाया हो।

कांग्रेस के नारायण दत्त तिवारी को छोड़ दें तो अधिकांश मुख्यमंत्रियों को कार्यकाल के दौरान राजनीतिक अस्थिरता व चुनौतियों का सामना करना पड़ा। यही वजह रही कि कांग्रेस लगातार भाजपा पर बार-बार सीएम बदलने को लेकर निशाना साधती रही है।

इसी बीच सीएम पुष्कर सिंह धामी ने हालिया कैबिनेट विस्तार के जरिए कई राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है। लंबे समय से लंबित इस विस्तार को लागू कर उन्होंने न केवल अटकलों पर विराम भी लगाया, बल्कि अपनी दूसरी पारी को मजबूती भी दी है।

धामी सरकार के 4 साल से अधिक के कार्यकाल में कई बार बदलाव की चर्चाएं उठीं, लेकिन सीएम ने शांत तरीके से अपने काम को आगे बढ़ाया। चुनाव से करीब 9 महीने पहले मंत्रिमंडल का विस्तार कर उन्होंने राजनीतिक रूप से अपनी स्थिति को और मजबूत भी किया है।

धामी के नेतृत्व में वर्षों से खाली पड़े 5 कैबिनेट पदों को भर दिया गया है। इससे साफ संकेत मिलता है कि भाजपा अब सरकार की उपलब्धियों के साथ जनता के बीच जाने की तैयारी में भी है। नए मंत्रियों को अलग-अलग क्षेत्रों और वर्गों से शामिल कर सरकार ने संगठनात्मक व सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश की है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले एंटी-इंकम्बेंसी (सत्ता विरोधी लहर) को कम करने की रणनीति का हिस्सा भी है। नए चेहरे अब मैदान में उतरकर सरकार की योजनाओं व उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाएंगे।

बताया जा रहा है कि मंत्रिमंडल विस्तार के पीछे प्रशासनिक कारण भी रहे। सीएम के पास कई महत्वपूर्ण विभागों का अतिरिक्त प्रभार था, जिसे अब नए मंत्रियों में बांटकर चुनाव से पहले जिम्मेदारियों को संतुलित भी किया गया है।

वहीं, केंद्रीय नेतृत्व की ओर से साफ संदेश भी दिया गया है। हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के हरिद्वार दौरे के बाद पार्टी नेताओं को गुटबाजी से दूर रहकर चुनाव की तैयारी में जुटने के निर्देश भी मिले थे।

कुल मिलाकर, सीएम पुष्कर सिंह धामी का यह कैबिनेट विस्तार सिर्फ प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संकेत भी माना जा रहा है, जिसमें संगठन व सरकार के बीच संतुलन साधते हुए 2027 की चुनावी रणनीति को धार भी दी गई है।