देहरादून-चमोली में सबसे ज्यादा गौरैया, WII के अध्ययन में चौंकाने वाले खुलासे

देहरादून: उत्तराखंड में गौरैया (स्पैरो) की संख्या और उसके रहन-सहन को लेकर किए गए एक अध्ययन में कई अहम तथ्य भी सामने आए हैं। Wildlife Institute of India (WII) द्वारा 2021 से शुरू इस शोध में पाया गया कि देहरादून व चमोली जिलों में गौरैया की संख्या सबसे अधिक है, जबकि हरिद्वार में सबसे कम भी पाई गई।

इस अध्ययन को डॉ. सुरेश कुमार के निर्देशन में शोधार्थी रेणु बाला ने संचालित भी किया। ट्रांजिट सर्वे व मीन काउंट के आधार पर तैयार रिपोर्ट के अनुसार, देहरादून व चमोली के बाद चंपावत व नैनीताल में गौरैया की अच्छी खासी मौजूदगी दर्ज की गई है। वहीं शहरों में गांवों की तुलना में गौरैया की संख्या करीब दो-तिहाई कम भी पाई गई।

शोध में गौरैया के पसंदीदा वास स्थलों (माइक्रो हैबिटेट) का भी विश्लेषण भी किया गया। इसमें सबसे अधिक गौरैया कूड़े वाली जगहों पर मिलीं, जहां उन्हें छोटे कीड़े आसानी से भी मिल जाते हैं। इसके बाद झाड़ियों वाले क्षेत्र, निजी गार्डन व चौथे स्थान पर परचून की खुली दुकानें हैं, जहां बिखरे अनाज उनके भोजन का प्रमुख स्रोत भी बनते हैं।

अध्ययन में ऊंचाई के आधार पर भी गौरैया की विशेषताओं का विश्लेषण भी किया गया। 3000 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई पर पाई जाने वाली गौरैया में खास अनुकूलन क्षमता भी देखी गई। इनमें हीमोग्लोबिन का स्तर करीब 21 ग्राम प्रति डेसीलीटर पाया गया, जबकि निचले इलाकों की गौरैया में यह लगभग 18 ग्राम प्रति डेसीलीटर भी होता है। अधिक हीमोग्लोबिन के कारण ये पक्षी कम ऑक्सीजन वाले क्षेत्रों (हाइपोक्सिया) में भी आसानी से जीवित भी रह पाते हैं।

इसके अलावा ऊंचाई पर रहने वाली गौरैया के पंख लंबे होते हैं व शरीर पर घने पंख होते हैं, जो उन्हें ठंड से बचाते हैं। सर्दियों के मौसम में ये गौरैया निचले इलाकों की ओर प्रवास भी करती हैं।

यह अध्ययन न केवल गौरैया के व्यवहार और अनुकूलन को समझने में मदद भी करता है, बल्कि शहरीकरण के कारण घटती संख्या को लेकर भी महत्वपूर्ण संकेत भी देता है।