In Sawan, a flood of Shiva devotees, devotees gathered for Jalabhishek in Shiva temples of Uttarakhand including Kankhal – Rain of faith on the Jyotirths of Shiva and Shakti
उत्तराखंड में सावन मास की बारिश के बीच आज श्रद्धा की भी वर्षा हो ही रही है। सुबह से रुक-रुक कर हो रही बारिश के बावजूद शिव मंदिरों में भोलेनाथ के भक्तों की लंबी कतारें भी देखी जा रही हैं। गंगा जल व बेलपत्र लेकर हर हर महादेव के जयकारों के साथ भक्त जलाभिषेक के लिए प्रसिद्ध शिवालयों की ओर उमड़ भी रहे हैं।
कनखल: जहाँ शिव और शक्ति का इतिहास जीवित है
हरिद्वार के कनखल की भूमि आज भी साक्षी है उस अध्यात्मिक गाथा की, जहां राजा दक्ष ने यज्ञ का आयोजन भी किया था, और जहाँ भगवती सती ने पिता के अपमान पर स्वयं को यज्ञाग्नि में समर्पित भी कर दिया था। इसी भूमि पर शिव ने दक्षसुता सती को ब्याहा था और आज भी सावन के माह में भगवान शंकर दक्षेश्वर बनकर कनखल में विराजते भी हैं।
दस ज्योतिर्लिंग सदृश केंद्र: सावन में कांवड़ियों पर होती है शिव-कृपा
उत्तराखंड में शिव व शक्ति के 10 दिव्य ज्योतिर केंद्र हैं — 5 शिवत्व के और 5 शक्तिपीठों के।
शिव के 5 ज्योतिर्थल:
- दक्षेश्वर
- बिल्वकेश्वर
- नीलेश्वर
- वीरभद्र
- नीलकंठ
शक्ति के 5 ज्योतिर्थल:
- मायादेवी
- शीतला मंदिर (जहां सती का जन्म हुआ)
- सतीकुंड
- मनसा देवी
- चंडी देवी
इन सभी केंद्रों को जोड़कर एक दिव्य ऊर्जा-संग्रह भी बनता है — शिव का केंद्र आकाश में ही माना गया है, जबकि शक्ति का केंद्र पाताल में स्थित है। यही शक्ति व शिव का संतुलन ब्रह्मांड को गति देता है।
सावन: जब आस्था और पौराणिक ऊर्जा का संगम होता है
कहा जाता है कि सावन में भगवान शिव कनखल आते हैं, अपने वचनों को निभाने, और उस धरती को पुनः तपोभूमि बनाने, जहां सती ने अपना जीवन समर्पित भी किया था। कांवड़िए गंगा जल लेकर इन पवित्र स्थलों की यात्रा करते हैं और शिवलिंग पर जल चढ़ाकर मोक्ष की कामना भी करते हैं।
आज सावन के इस विशेष सोमवार को, कनखल से लेकर नीलकंठ तक हर शिवालय आस्था से आलोकित भी है। उत्तराखंड की ये दिव्य भूमि हर वर्ष की भांति इस बार भी हजारों कांवड़ियों की भावनाओं, संकल्पों व शिवभक्ति की साक्षी भी बन रही है।
