Crisis in mountain-village agriculture; the burden on elderly women grows, while the younger generation heads toward the cities.
उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में खेती-किसानी की तस्वीर तेजी से बदल रही है। कभी बुवाई, निराई-गुड़ाई और फसल कटाई के दौरान खेतों में महिलाओं की सामूहिक भागीदारी दिखाई देती थी, लेकिन अब गांवों के खेतों में पहले जैसी रौनक नहीं रही। बच्चों की बेहतर शिक्षा और रोजगार की तलाश में युवा पीढ़ी शहरों की ओर रुख कर रही है। ऐसे में खेती और पशुपालन की जिम्मेदारी काफी हद तक बुजुर्ग महिलाओं के कंधों पर आ गई है। वहीं, बंदरों, जंगली सुअरों और आवारा पशुओं से फसलों को हो रहा नुकसान भी किसानों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।
रानीखेत तहसील के विश्वा गांव की बुजुर्ग महिला चंद्रा देवी बताती हैं कि युवा बहुओं के गांव से बाहर रहने के कारण खेती का काम बुजुर्ग महिलाओं को ही संभालना पड़ रहा है। उम्र बढ़ने के बावजूद उन्हें खेतों में निराई-गुड़ाई करने और पशुओं के लिए चारा जुटाने में जुटना पड़ता है। सीम गांव की कुंती देवी का कहना है कि जंगली जानवर फसलों को बर्बाद कर देते हैं। इससे दिनभर मेहनत करने के बाद भी पर्याप्त उपज नहीं मिल पाती।
सोमेश्वर क्षेत्र के शैल गांव की जानकी देवी के अनुसार, पहले परिवार के सभी सदस्य खेती-किसानी में हाथ बंटाते थे। महिलाएं मिल-जुलकर बुवाई से लेकर फसल कटाई तक के काम करती थीं, लेकिन अब खेती और पशुपालन की जिम्मेदारी निभाना मुश्किल होता जा रहा है। सोमेश्वर निवासी युवा महिला भावना का कहना है कि खेती में मेहनत अधिक है, जबकि आमदनी मौसम और फसल पर निर्भर करती है। बच्चों की पढ़ाई, परिवार की जिम्मेदारियों और रोजगार के बीच खेती के लिए समय निकालना कठिन हो गया है। बेहतर सुविधाओं और अच्छी आमदनी के बिना युवा पीढ़ी को खेती से जोड़ना आसान नहीं है।
द्वाराहाट विकासखंड की ग्राम पंचायत घगलोड़ी की ग्राम प्रधान दीपा त्रिपाठी का कहना है कि बंदरों, जंगली सुअरों और आवारा पशुओं से फसलों को नुकसान पहुंच रहा है। उन्होंने खेती की सुरक्षा के लिए प्रभावी नीति बनाने और गांवों में महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की जरूरत पर जोर दिया।
रानीखेत की दीपा पंत बताती हैं कि बच्चों की अच्छी शिक्षा और बेहतर भविष्य के लिए रानीखेत में रहना जरूरी हो गया है। गांव में शिक्षा और रोजगार के सीमित अवसरों के चलते परिवार को शहर के नजदीक बसाने का निर्णय लेना पड़ा। उनके मुताबिक, पहले महिलाएं खेती-बाड़ी में काफी समय देती थीं, लेकिन अब बच्चों की पढ़ाई और दूसरी जिम्मेदारियों के कारण गांव के खेतों में उनकी भागीदारी पहले जैसी नहीं रह गई है।
मजखाली की मीना रावत का कहना है कि गांव छोड़ना शौक नहीं, बल्कि बच्चों की पढ़ाई और बेहतर भविष्य के लिए मजबूरी है। गांव में अच्छी शिक्षा और रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं होने के कारण शहर में रहना पड़ता है। हालांकि, गांव और परिवार से उनका लगाव आज भी बना हुआ है।
वहीं, स्याल्दे की नीमा पपनोई का कहना है कि आज महिलाएं आत्मनिर्भर बनकर आगे बढ़ना चाहती हैं। पहले महिलाओं का जीवन घर-परिवार और खेती-किसानी तक सीमित था, लेकिन अब समय बदल रहा है। शिक्षित महिलाएं स्वरोजगार के माध्यम से अपनी पहचान बना रही हैं। महिलाओं का आत्मनिर्भर बनना जरूरी है, ताकि वे परिवार और समाज में अहम भूमिका निभा सकें।
पहाड़ के गांवों की यह तस्वीर खेती-किसानी के सामने खड़ी चुनौतियों को उजागर करती है। एक ओर बुजुर्ग महिलाएं खेती और पशुपालन का बोझ संभाल रही हैं, तो दूसरी ओर युवा पीढ़ी शिक्षा और रोजगार के लिए गांवों से दूर जा रही है। खेती को बचाने के लिए फसलों की सुरक्षा, बेहतर सुविधाओं, अच्छी आमदनी और गांवों में रोजगार के अवसरों पर ध्यान देना जरूरी है।
