कट ऑफ डेट से बढ़ी अनिश्चितता, 2018 के बाद नियुक्त उपनल कर्मियों का भविष्य अधर में
उपनल कर्मियों को ‘समान काम–समान वेतन’ पर सरकार का फैसला, 2018 के बाद नियुक्त कर्मचारियों पर संशय बरकरार
देहरादून: उत्तराखंड में उपनल कर्मियों को समान काम के बदले समान वेतन देने को लेकर करीब 8 साल से चल रही कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया के बाद सरकार ने आखिरकार निर्णय भी जारी कर दिया है। हालांकि इस फैसले के साथ ही 12 नवंबर 2018 के बाद नियुक्त कर्मियों के भविष्य को लेकर नई बहस भी शुरू हो गई है।
यह मामला साल 2018 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए ऐतिहासिक निर्णय से जुड़ा है, जिसमें समान कार्य करने वाले उपनल कर्मियों को समान वेतन देने व नियमितीकरण पर विचार करने के निर्देश भी दिए गए थे। मामला बाद में सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा और शासन स्तर पर कई दौर की कवायद के बाद 3 फरवरी 2026 को आदेश भी जारी किया गया।
सरकार ने 12 नवंबर 2018 को कट ऑफ डेट मानते हुए लाभ 2 चरणों में देने का निर्णय लिया है। पहले चरण में 1 जनवरी 2016 से पहले नियुक्त कर्मियों को लाभ मिलेगा, जबकि दूसरे चरण में 1 जनवरी 2016 से 12 नवंबर 2018 तक नियुक्त कर्मियों को शामिल भी किया जाएगा। शासन का कहना है कि इस चरणबद्ध व्यवस्था से वित्तीय भार संतुलित रखते हुए न्यायालय के आदेशों का पालन भी किया जाएगा।
हालांकि कर्मचारी संगठनों का कहना है कि अदालत ने केवल वेतन ही नहीं, बल्कि नियमितीकरण पर भी स्पष्ट निर्देश भी दिए थे। विनोद कवि, अध्यक्ष विद्युत संविदा कर्मचारी संगठन, का कहना है कि 2018 के बाद नियुक्त कर्मियों को लाभ से बाहर रखना न्यायसंगत ही नहीं है। उनका तर्क है कि यदि समान कार्य का सिद्धांत लागू किया गया है तो उसे तारीख के आधार पर सीमित ही नहीं किया जाना चाहिए।
राज्य के ऊर्जा, स्वास्थ्य, शिक्षा व प्रशासनिक विभागों में हजारों कर्मचारी उपनल के माध्यम से कार्यरत हैं। 12 नवंबर 2018 के बाद नियुक्त कर्मचारियों को लेकर स्पष्ट नीति न बनने से असंतोष की स्थिति भी बनी हुई है। कर्मचारी संगठनों ने संकेत दिए हैं कि यदि इस वर्ग के लिए भी नीति स्पष्ट नहीं की गई तो वे कानूनी विकल्पों पर विचार भी कर सकते हैं।
फिलहाल 2018 तक नियुक्त कर्मियों को लंबे इंतजार के बाद राहत भी मिली है, लेकिन बाद में नियुक्त कर्मचारियों का भविष्य अब भी अधर में लटका भी हुआ है।