चंपावत: खोई सेवा पुस्तिका खोजने के लिए देव दरबार का सहारा? वायरल आदेश से मचा हड़कंप, अधिकारी बोले…

चंपावत  उत्तराखंड के चंपावत जिले से लोक निर्माण विभाग (PWD) के एक अजीबोगरीब आदेश ने सोशल मीडिया पर सनसनी ही मचा दी है। आदेश में खोई हुई सेवा पुस्तिका की तलाश के लिए देवता की अदालत में गुहार लगाने व सभी कर्मचारियों को अपने-अपने घर से 2 मुट्ठी चावल लाने का निर्देश भी दिया गया है।

यह पत्र सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और लोग इस पर मजाकिया टिप्पणियां भी कर रहे हैं। वहीं, जिस अधिकारी के नाम से यह आदेश जारी हुआ, उन्होंने इसे फर्जी बताया भी है और जांच की बात भी कही है।

क्या है वायरल आदेश में?

राष्ट्रीय राजमार्ग खंड, लोक निर्माण विभाग, लोहाघाट के अधिशासी अभियंता आशुतोष कुमार के हस्ताक्षर से जारी भी कथित आदेश में कहा गया है कि अपर सहायक अभियंता जय प्रकाश की सेवा पुस्तिका विभागीय अलमारी से गायब भी हो गई है। लंबे समय से तलाश के बावजूद जब दस्तावेज नहीं मिले, तो अब दैवीय शक्ति का सहारा लेने का निर्णय भी लिया गया।

आदेश में लिखा है कि, “चूंकि दस्तावेज नहीं मिल रहा है और संबंधित कर्मचारी मानसिक तनाव में हैं, इसलिए कार्यालय के सभी कर्मचारी 17 मई को अपने घर से दो मुट्ठी चावल लाकर लाएं, जिन्हें किसी मंदिर में अर्पित किया जाएगा ताकि ‘देवता न्याय कर सकें’।”

क्या कहा अधिशासी अभियंता ने?

जब इस अजीब आदेश की खबर फैली, तो खुद अधिशासी अभियंता आशुतोष कुमार ने सामने आकर बयान दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि,

“मेरे द्वारा इस तरह का कोई आदेश जारी नहीं किया गया है। यह पत्र फर्जी है और मैं इसकी आंतरिक जांच करवा रहा हूं।”

सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रियाएं

  • कुछ लोगों ने इस आदेश को बाबा-टाइप ऑफिस सिस्टम कहा।
  • कई यूजर्स ने चुटकी लेते हुए लिखा कि अब RTI और देवता मिलकर खोजेंगे दस्तावेज।
  • कुछ ने पूछा कि “कहीं यह नई ‘फाइल ट्रेसिंग पॉलिसी’ तो नहीं?”

सवाल खड़े करता है मामला

  • क्या वाकई सरकारी कार्यालयों में अब दैवीय उपायों से समस्याओं का हल खोजा जाएगा?
  • अगर आदेश फर्जी है, तो इस तरह के दस्तावेज कैसे तैयार हुए और किसने लीक किए?
  • क्या यह विभागीय लापरवाही छुपाने की कोशिश है या महज मजाक?

वायरल आदेश ने जहां विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं, वहीं अधिकारी के फर्जी कहे जाने के बाद अब निगाहें जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर सरकारी तंत्र की दस्तावेजीय सतर्कता और गोपनीयता पर बहस छेड़ दी है।