हिमालयी राज्यों में हर साल औसतन 132 हिमस्खलन, जम्मू-कश्मीर सबसे अधिक प्रभावित
देश के हिमालयी राज्यों में हर वर्ष औसतन 132 हिमस्खलन की घटनाएं भी सामने आ रही हैं। इनमें सबसे ज्यादा घटनाएं जम्मू-कश्मीर में रिपोर्ट भी हो रही हैं, जहां हिमस्खलन की साइटों की संख्या सबसे अधिक भी है। हिमस्खलन को लेकर रक्षा भू-सूचना विज्ञान अनुसंधान प्रतिष्ठान (डीजीआरई) नियमित रूप से पूर्वानुमान भी जारी करता है।
डीजीआरई ने जम्मू-कश्मीर, लद्दाख समेत अन्य हिमालयी क्षेत्रों में 70 सरफेस ऑब्जर्वेटरी व ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन स्थापित किए हैं। मौसम संबंधी सटीक जानकारी जुटाने के लिए इन क्षेत्रों में कर्मियों की तैनाती की जाती है। डीजीआरई के वैज्ञानिक डॉ. सुधांशु शेखर के अनुसार, एकत्र किए गए आंकड़े चंडीगढ़ स्थित केंद्र भेजे जाते हैं, जहां सुपर कंप्यूटर व वैज्ञानिक मॉडलों के आधार पर हिमस्खलन का पूर्वानुमान भी तैयार किया जाता है।
डॉ. शेखर ने बताया कि साल 2020-21 से 2024-25 के बीच जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड व सिक्किम में कुल 661 हिमस्खलन की घटनाएं भी दर्ज की गई हैं, यानी औसतन हर वर्ष 132 घटनाएं। ये केवल रिपोर्ट की गई घटनाएं हैं, वास्तविक संख्या इससे अधिक भी हो सकती है। इस अवधि में जम्मू-कश्मीर में सबसे अधिक करीब 500 घटनाएं, हिमाचल प्रदेश में 150, उत्तराखंड में 10 बड़े हिमस्खलन भी दर्ज किए गए, जबकि सिक्किम में औसतन एक ही घटना सामने आई। उत्तर-पूर्वी राज्यों में भी अब हिमस्खलन की घटनाओं का अध्ययन शुरू भी कर दिया गया है।
हिमस्खलन की साइटों की बात करें तो जम्मू-कश्मीर में करीब 1000 साइटें चिह्नित की गई हैं, हिमाचल प्रदेश में 200 व उत्तराखंड में लगभग 100 साइटें चिन्हित की जा चुकी हैं। डॉ. शेखर के अनुसार, हिमस्खलन की घटनाओं में बढ़ोतरी या कमी काफी हद तक रिपोर्टिंग पर ही निर्भर करती है, लेकिन यह स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन के चलते कम समय में अधिक बर्फबारी भी हो रही है, जिससे हिमस्खलन का खतरा और भी बढ़ गया है।