Asha Bhosle is no more, but her voice will live on forever in the songs of Nainital and Uttarakhand.
स्वर कोकिला आशा भोसले के निधन से देशभर में शोक की लहर है। 92 वर्ष की उम्र में बीते रविवार को उन्होंने मुंबई में अंतिम सांस ली। लेकिन अपने सदाबहार गीतों के जरिए उन्होंने नैनीताल, रानीखेत व उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान को हमेशा के लिए अमर भी कर दिया।
नैनीताल की वादियों में फिल्माए गए उनके कई गीत आज भी लोगों के दिलों में ही बसे हैं। फिल्म गुमराह का महेंद्र कपूर के साथ गाया डुएट “इन हवाओं में, इन फिजाओं में…” और फिल्म आदमी और इंसान का “जिंदगी के रंग कई रे…” सुनते ही नैनीताल की झीलें, पहाड़ व जादुई नजारे आंखों के सामने ही तैर उठते हैं। वहीं कटी पतंग के चर्चित गीत “मेरा नाम है शबनम…” के कुछ दृश्य भी नैनीताल में ही फिल्माए गए थे, जिसने इस शहर की खूबसूरती को देशभर में नई पहचान भी दी।
साल 1969 की फिल्म बेटी में उनका गाया गीत “लहंगा मंगा दे मेरे बाबू आज नैनीताल से…” नैनीताल के नाम को घर-घर तक पहुंचाने वाला गीत भी बना। इस गीत ने पर्यटन व सांस्कृतिक पहचान दोनों स्तर पर शहर को खास लोकप्रियता भी दिलाई। रानीखेत में शूट हुई फिल्मों दिल दे के देखो व हनीमून के उनके गीत भी आज तक लोगों की यादों में भी ताजा हैं।
आशा भोसले का उत्तराखंड की संस्कृति से खास लगाव भी था। वह यहां बार-बार आने की इच्छा भी जताती थीं। अल्मोड़ा महोत्सव में उनके आने का कार्यक्रम भी तय हुआ था, लेकिन स्वास्थ्य कारणों से अंतिम समय में यह रद्द ही हो गया था। उनकी बहन उषा मंगेशकर ने उस कार्यक्रम में प्रस्तुति भी दी थी।
सिर्फ हिंदी सिनेमा ही नहीं, आशा भोसले ने गढ़वाली सिनेमा को भी अपनी आवाज से समृद्ध भी किया। गढ़वाली फिल्म ग्वेर छोरा के लिए उन्होंने भावपूर्ण गीत “जनमो को साथ छे” गाया, जो पहाड़ के सीधे-साधे चरवाहे के जीवन को खूबसूरती से भी दर्शाता है। यही वजह है कि उत्तराखंड की लोक-संस्कृति व संगीत प्रेमियों के दिलों में उनकी आवाज हमेशा गूंजती रहेगी।
