उत्तराखंड में बढ़ रहे जानलेवा भूस्खलन: 1868 से अब तक 1516 मौतें, वाडिया संस्थान के अध्ययन में चौंकाने वाले खुलासे
उत्तराखंड में जानलेवा भूस्खलन की घटनाओं में लगातार ही वृद्धि हो रही है। यह तथ्य वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान द्वारा किए गए विस्तृत अध्ययन में सामने भी आया है। अध्ययन में भूस्खलन के कारणों, चट्टानों के प्रकार, ढलान, वर्षा के पैटर्न व भूकंपीय गतिविधियों जैसे विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण भी किया गया।
संस्थान ने वर्ष 1868 से 2023 के बीच राज्य में हुए 64 जानलेवा व रिपोर्टेड भूस्खलनों का अध्ययन भी किया। इन घटनाओं में कुल 1516 लोगों की मृत्यु भी दर्ज की गई। अध्ययन का उद्देश्य आपदा के कारणों को समझकर भविष्य में इसके प्रभाव को कम करने की रणनीति तैयार करना भी है।
भूकंप और बारिश का गहरा संबंध
अध्ययन के अनुसार अधिकांश भूस्खलन भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील मेन सेंट्रल थ्रस्ट (MCT) के आसपास ही हुए हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस क्षेत्र में आने वाले छोटे-छोटे भूकंप चट्टानों को कमजोर भी कर देते हैं और उनके बीच की पकड़ ढीली भी हो जाती है। इसके बाद जब भारी वर्षा होती है तो पानी दरारों में प्रवेश कर चट्टानों को और अस्थिर बना देता है, जिससे भूस्खलन की घटनाएं भी बढ़ जाती हैं।
हल्के भूस्खलन आमतौर पर 24 घंटे से कम अवधि की बारिश में होते हैं, जबकि बड़े व घातक भूस्खलन 48 से 72 घंटे तक लगातार वर्षा होने पर देखने को भी मिलते हैं। बढ़ते भूजल स्तर और वर्षा के बदलते पैटर्न को भी इसके प्रमुख कारणों में शामिल भी किया गया है।
67 प्रतिशत घटनाएं वर्ष 2000 के बाद
अध्ययन में सामने आया कि लगभग 67 प्रतिशत जानलेवा भूस्खलन व 84 प्रतिशत अत्यधिक वर्षा की घटनाएं वर्ष 2000 के बाद दर्ज भी की गईं। सबसे अधिक 52 घातक भूस्खलन मानसून (जून से सितंबर) के दौरान ही हुए। वर्ष 2017 में सर्वाधिक पांच जानलेवा घटनाएं भी सामने आईं।
किन चट्टानों में ज्यादा खतरा
वैज्ञानिकों ने पाया कि नीस (19 घटनाएं) व क्वार्टजाइट (14 घटनाएं) चट्टानों वाले क्षेत्रों में भूस्खलन अधिक हुए। लाइमस्टोन क्षेत्रों में भी कई घटनाएं भी दर्ज की गईं। इस शोध में वैज्ञानिक यशपाल सुंदरियाल, अनिरुद्ध चौहान व समीक्षा कौशिक शामिल रहे। अध्ययन का शोधपत्र हाल ही में इंडियन एकेडमी ऑफ साइंसेज की जर्नल ‘जर्नल ऑफ अर्थ सिस्टम साइंस’ में प्रकाशित भी हुआ है।
प्रदेश की प्रमुख भूस्खलन घटनाएं
राज्य के इतिहास में कई भीषण भूस्खलन दर्ज हैं।
- 18 अगस्त 1998 को मालपा (पिथौरागढ़) में 210 लोगों की मौत भी हुई।
- 1880 में नैनीताल में 151 लोगों की जान गई।
- अगस्त 1951 में रुद्रप्रयाग के शिवनंदी गांव में 100 लोगों की मृत्यु हुई।
- अगस्त 1998 में मद्महेश्वर घाटी में 103 लोगों की जान गई।
- जुलाई 1990 में नीलकंठ महादेव मंदिर क्षेत्र में 100 लोगों की मौत हुई।
विशेषज्ञों का मानना है कि वैज्ञानिक अध्ययन और बेहतर आपदा प्रबंधन रणनीति के जरिए भविष्य में जानमाल के नुकसान को कम भी किया जा सकता है।