पलायन से कमजोर हो रहा पहाड़ का राजनीतिक प्रतिनिधित्व, वोटर डेटा दे रहा गवाही

मतदाता कम, चिंता ज्यादा: खिसक रही है पहाड़ की राजनीतिक जमीन आबादी घटने से पहाड़ की सियासी ताकत पर असर, आंकड़े कर रहे पुष्टि पलायन ने हिलाई पहाड़ की सियासत, वोटर लिस्ट्स ने खोली हकीकत

देहरादून। दक्षिण भारत के राज्यों में परिसीमन को लेकर मुख्यमंत्रियों की सक्रियता के बीच अब उत्तराखंड में भी इस संवेदनशील मुद्दे को लेकर सुगबुगाहट भी शुरू हो गई है। भले ही परिसीमन आयोग का गठन अभी न हुआ हो और उससे पहले जनगणना भी बाकी हो, लेकिन हिमालयी राज्य के भीतर इस विषय पर मंथन अब तेज होता नजर आ रहा है।

उत्तराखंड, जिसे पर्वतीय राज्य की अवधारणा पर गठित किया गया था, आज जनसंख्या असंतुलन की बड़ी चुनौती से जूझ रहा है। पिछले दो दशकों में राज्य के नौ पहाड़ी जिलों से आबादी में गिरावट और 4 मैदानी जिलों में तीव्र वृद्धि ने परिसीमन को लेकर चिंताएं गहरा दी हैं।

पलायन बना बड़ा कारण, 5 लाख से ज्यादा ने छोड़ा गांव

2018 में राज्य सरकार द्वारा गठित पलायन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड से 5 लाख से अधिक लोगों ने पलायन किया, जिनमें से 3 लाख से अधिक लोग आजीविका या सुविधाओं के अभाव में गांव छोड़कर अन्यत्र चले गए। इसके बाद से सरकार रिवर्स पलायन को प्रोत्साहित करने के लिए प्रयासरत है।

गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी द्वारा चलाया गया मेरा वोट-मेरा गांव अभियान, इसी दिशा में एक कोशिश है। वे लोगों को उनके पैतृक गांवों में मतदाता बनने के लिए प्रेरित कर रहे हैं, जिससे पहाड़ों में मतदाता संख्या में वृद्धि भी हो सके।

मैदान में वोटर बढ़े 72 फीसदी, पहाड़ में सिर्फ 21 फीसदी

वर्ष 2002 में राज्य के मैदानी जिलों में कुल मतदाताओं की हिस्सेदारी 52.7% थी, जबकि पहाड़ी जिलों में 47.3%। लेकिन वर्ष 2022 तक यह संतुलन बिगड़ ही चुका है। अब मैदानी जिलों में मतदाता प्रतिशत बढ़कर 60.6% हो गया है, जबकि पर्वतीय जिलों में यह घटकर 39.4% ही रह गया है।

बीते एक दशक में जहां मैदानी जिलों में मतदाता वृद्धि दर 72% रही, वहीं पहाड़ी जिलों में यह सिर्फ 21% तक ही सीमित रही। यह अंतर जनसांख्यिकीय असंतुलन की गंभीर तस्वीर भी पेश करता है, जिसका असर भविष्य के परिसीमन में दिखाई दे सकता है।

कनेक्टिविटी और आजीविका से पलायन रोकने की उम्मीद

सरकार की ओर से चारधाम ऑलवेदर रोड, ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना और हवाई संपर्क के विस्तार जैसे कदमों से पहाड़ों में विकास की गति बढ़ाने की उम्मीद भी की जा रही है। साथ ही सोलर ऊर्जा, होमस्टे और उद्यानिकी योजनाओं को भी रोजगार के नए स्रोतों के रूप में देखा भी जा रहा है।

विशेषज्ञों की राय: क्षेत्रफल आधारित परिसीमन हो विकल्प

पर्यावरणविद अनिल जोशी का कहना है कि यह संकट सिर्फ उत्तराखंड का नहीं, बल्कि पूरे देश के ग्रामीण क्षेत्रों का है, जहां सुविधाओं और रोजगार के अभाव में लोग पलायन भी कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “अगर पर्वतीय राज्य की अवधारणा को जीवित रखना है, तो सरकारों को पहाड़ों में विकास और रोजगार के अवसरों को प्राथमिकता भी देनी होगी।”

सामाजिक कार्यकर्ता अनूप नौटियाल का मानना है कि अब यह जरूरी हो गया है कि परिसीमन का आधार जनसंख्या के बजाय क्षेत्रफल हो। उनका कहना है, “रिवर्स पलायन जैसे उपाय फिलहाल ऊंट के मुंह में जीरे जैसे हैं, इसलिए संतुलन बनाए रखने के लिए क्षेत्रफल आधारित परिसीमन ही एकमात्र समाधान ही नजर आता है।”

परिसीमन से पहले जनगणना, लेकिन चर्चा अभी से

सभी जानकार इस बात पर सहमत हैं कि परिसीमन अभी दूर है, लेकिन उसकी तैयारी अभी से शुरू होनी चाहिए। जनप्रतिनिधित्व में संतुलन लाने के लिए पहाड़ी क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या बढ़ाना भी जरूरी है। इसके लिए सतत विकास, आजीविका के संसाधनों का विस्तार और जड़ों से जोड़ने वाले कार्यक्रमों की जरूरत भी है।