केदारघाटी में अवैध खनन का खेल जारी, मंदाकिनी किनारे मशीनों से दोहन पर उठे सवाल
रुद्रप्रयाग जिले की केदारघाटी में आपदा प्रभावित क्षेत्रों में भी अवैध खनन का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। मंदाकिनी नदी किनारे खनन माफिया खुलेआम नदी का दोहन करते नजर भी आ रहे हैं, जबकि जिम्मेदार विभागों की भूमिका पर सवाल भी उठ रहे हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार, केदारघाटी के कई इलाकों में खनन का कारोबार तेजी से भी बढ़ रहा है। हैरानी की बात यह है कि वर्ष 2013 की आपदा से प्रभावित क्षेत्रों में भी खनन व चुगान की अनुमति दी गई है, जिससे भविष्य में खतरे की आशंका और भी बढ़ गई है। इससे न केवल बस्तियों पर संकट मंडरा रहा है, बल्कि राजमार्ग व पुलों की मजबूती पर भी असर पड़ सकता है।
गंगानगर पुल के पास राजमार्ग से सटे क्षेत्र में इन दिनों भारी मशीनों से नदी के बीचों-बीच खनन भी किया जा रहा है। एक ओर जहां पुल व सड़क की सुरक्षा के लिए कार्य चल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उसी इलाके में खनन जारी है, जो कई सवाल भी खड़े करता है।
सामाजिक कार्यकर्ता भगत चौहान ने आरोप लगाया कि खनन विभाग की लापरवाही के चलते राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) के नियमों की खुलेआम अनदेखी भी हो रही है। उन्होंने कहा कि पुलों व सार्वजनिक स्थलों के पास खनन पर प्रतिबंध के बावजूद नियमों का पालन ही नहीं किया जा रहा है।
जिला खनन अधिकारी वीरेंद्र कुमार का कहना है कि नियमानुसार पुलों से 100 मीटर व सार्वजनिक स्थलों से 50 मीटर के दायरे में खनन की अनुमति ही नहीं दी जाती। केवल उन स्थानों पर सीमित अवधि के लिए मलबा हटाने की अनुमति दी जाती है, जहां कटाव या नुकसान की आशंका भी हो।
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि आपदाग्रस्त क्षेत्रों व पुलों के आसपास खनन भविष्य के लिए खतरनाक भी साबित हो सकता है। उनका कहना है कि केदारघाटी भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील जोन में आती है और यहां प्रकृति के साथ छेड़छाड़ बड़े खतरे को जन्म भी दे सकती है।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अनियंत्रित खनन से नदियों का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है और जलीय जीव-जंतुओं का अस्तित्व खतरे में भी पड़ सकता है। ऐसे में समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं हुई तो इसके गंभीर परिणाम भी सामने आ सकते हैं।