'Kalabansa' is spreading rapidly in the forests of Champawat, posing an increasing threat to local vegetation, including oak and rhododendron.
चंपावत: उत्तराखंड के जंगलों में तेजी से फैल रहा आक्रामक खरपतवार एगेरेटिना एडेनोफोरा यानी कालाबांसा जैव विविधता के लिए खतरा बन रहा है। चंपावत जिले के बनलेख वन क्षेत्र में किए गए एक शोध में सामने आया है कि इस पौधे के प्रसार से स्थानीय वनस्पतियों की विविधता और जंगलों की प्राकृतिक पुनर्जनन क्षमता प्रभावित हो रही है। समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया तो भविष्य में वनों की प्राकृतिक संरचना में भी बदलाव आ सकता है।
बांज और बुरांश समेत स्थानीय वनस्पतियों पर असर
सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय के चंपावत परिसर में वनस्पति विज्ञान विभाग की डॉ. कविता खत्री के निर्देशन में एमएससी के विद्यार्थियों ने यह अध्ययन किया। शोध रशियन जर्नल ऑफ बायोलॉजिकल इन्वेजन्स नामक वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।
शोध के अनुसार, चंपावत के कुछ मिश्रित वन क्षेत्रों में कालाबांसा का प्रसार लगातार बढ़ रहा है। इससे वनस्पति संरचना और स्थानीय पौधों की विविधता प्रभावित हो रही है। बांज, बुरांश, काफल और जड़ी-बूटियों जैसी स्थानीय वनस्पतियों पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव देखा गया है।
28 वनस्पति परिवारों की 53 प्रजातियां दर्ज
अध्ययन के दौरान कालाबांसा से प्रभावित और अप्रभावित क्षेत्रों में कुल 28 वनस्पति परिवारों की 53 पादप प्रजातियां दर्ज की गईं। इनमें जड़ी-बूटियों की प्रजातियां सबसे अधिक थीं, जबकि झाड़ियों और पेड़ों की प्रजातियों की संख्या अपेक्षाकृत कम रही।
शोध में एस्टेरेसी, साइपरेसी और पोएसी वनस्पति परिवारों का प्रजातीय विविधता में प्रमुख योगदान पाया गया। स्थानीय प्रजातियों में साइपेरस रोटंडस सबसे अधिक दर्ज की गई। यह पौधा खासतौर पर उन क्षेत्रों में ज्यादा मिला, जहां आक्रामक खरपतवार का प्रभाव नहीं था।
बनलेख वन रेंज में किया गया अध्ययन
शोध चंपावत बाजार से करीब 9.3 किलोमीटर दूर समुद्र तल से 1,880 मीटर की ऊंचाई पर स्थित बनलेख वन रेंज में किया गया। यह क्षेत्र मिश्रित शीतोष्ण बांज वनों के लिए जाना जाता है, जहां बांज, बुरांश और काफल समेत कई तरह के पेड़, झाड़ियां और जड़ी-बूटियां पाई जाती हैं।
अध्ययन क्षेत्र उपोष्णकटिबंधीय चीड़ वनों और अधिक ऊंचाई वाले शीतोष्ण चौड़ी पत्ती के वनों के बीच संक्रमण क्षेत्र का भी प्रतिनिधित्व करता है। स्थानीय लोग इस जंगल से चारा, ईंधन की लकड़ी और अन्य वन उत्पाद प्राप्त करते हैं।
शोध के लिए इस क्षेत्र को इसलिए चुना गया, क्योंकि यहां कालाबांसा से प्रभावित और अप्रभावित दोनों तरह के वन मौजूद हैं। इससे दोनों क्षेत्रों की वनस्पति संरचना और विविधता की तुलना की जा सकी।
जैव विविधता के साथ पारिस्थितिकी तंत्र पर भी असर
शोध के मुताबिक, कालाबांसा का प्रभाव केवल पौधों की विविधता तक सीमित नहीं है। इसके प्रसार से मिट्टी के स्थिरीकरण, कार्बन पृथक्करण और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास जैसी महत्वपूर्ण पारिस्थितिक प्रक्रियाएं भी प्रभावित हो सकती हैं।
शोधकर्ताओं ने इस आक्रामक पौधे के प्रसार को रोकने के लिए जन-जागरूकता, प्रभावी प्रबंधन और लंबे समय तक निगरानी की जरूरत बताई है।
समय रहते नियंत्रण जरूरी: डॉ. कविता खत्री
अध्ययन का निर्देशन करने वाली डॉ. कविता खत्री के अनुसार, बनलेख के मिश्रित वनों में एगेरेटिना एडेनोफोरा का बढ़ता प्रसार चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि यह खरपतवार जैव विविधता और जंगलों की प्राकृतिक पुनर्जनन क्षमता को नुकसान पहुंचा रहा है। इसके प्रभाव को सीमित करने के लिए समय रहते प्रभावी कदम उठाना जरूरी है।
