निजी उच्च शिक्षण संस्थानों की फीस पर 12 अध्यक्ष बदले, तीन साल में भी नहीं हो पाई संशोधन प्रक्रिया पूरी
प्रदेश के निजी उच्च शिक्षण संस्थानों में मेडिकल, इंजीनियरिंग व अन्य व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की फीस तय मानकों के अनुरूप है या नहीं, इसकी निगरानी के लिए सरकार ने प्रवेश एवं शुल्क नियामक समिति का गठन भी किया है। नियमों के अनुसार समिति को हर 3 वर्ष में फीस का पुनरीक्षण (रिवीजन) करना अनिवार्य है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि अब तक 12 अध्यक्ष बदलने के बावजूद शुल्क निर्धारण की प्रक्रिया पूरी ही नहीं हो सकी है।
इस बीच निजी संस्थानों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं की ओर से मनमाने शुल्क वसूले जाने के आरोप लगातार सामने भी आते रहे हैं। फीस को लेकर कई बार विवाद की स्थिति भी बनती रही है। जहां निजी संस्थान फीस को उचित बताते हैं, वहीं विद्यार्थियों व अभिभावकों की शिकायत है कि उनसे अत्यधिक शुल्क लिया जा रहा है और उसके अनुरूप बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध ही नहीं कराई जा रहीं।
इन्हीं शिकायतों के मद्देनजर राज्य सरकार ने प्रवेश एवं शुल्क नियामक समिति का गठन भी किया था। समिति में उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा नामित सेवानिवृत्त न्यायाधीश अध्यक्ष भी होते हैं। इसके अलावा सचिव चिकित्सा शिक्षा, सचिव तकनीकी शिक्षा व सचिव न्याय सदस्य के रूप में शामिल भी रहते हैं।
समिति में राज्य सरकार द्वारा नामित सचिव स्तर के सेवानिवृत्त अधिकारी, राज्यपाल द्वारा नामित राज्य विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति व सरकार द्वारा नामित दो प्रतिष्ठित शिक्षाविद भी सदस्य होते हैं। अध्यक्ष की ओर से एक चार्टर्ड अकाउंटेंट को नामित किया जाता है।
विभागीय सूत्रों के अनुसार समिति का अब तक कभी पूर्ण कोरम नहीं बन पाया, जिसके चलते नियमानुसार फीस का पुनरीक्षण ही नहीं हो सका। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि जब नियामक व्यवस्था ही सक्रिय नहीं है तो निजी संस्थानों की फीस पर प्रभावी नियंत्रण कैसे ही सुनिश्चित होगा।